बापू की नजर मे हिंदी
अगर मेरे हाथ में तानाशाही सत्ता हो तो मैं आज से ही विदेशी माध्यम के जरिए अपने लड़कों और लड़कियों की शिक्षा बंद कर दूं और सारे शिक्षकों और प्रोफेसरों से यह माध्यम तुरंत बदलवा दूं या उन्हें बर्खास्त करा दूं। मैं पाठ्य पुस्तकों की तैयारी का इंतजार नहीं करूंगा। वे तो माध्यम के परिवर्तन के पीछे पीछे चली आएंगी। युवक और युवतियां अंग्रेजी और दुनिया की दूसरी भाषाएं खूब पढ़ें और जरूर पढ़ें। लेकिन उनसे मैं आशा करूंगा कि वे अपने ज्ञान का प्रसाद भारत को और सारे संसार को उसी तरह प्रदान करेंगे जैसे बोस, राय और स्वयं कवि रवींद्र नाथ ने प्रदान किया है। मगर मैं हरगिज यह नहीं चाहूंगा कि कोई भी हिंदुस्तानी अपनी मातृभाषा को भूल जाए या उसकी उपेक्षा करे कि अपनी मातृभाषा के जरिए वह ऊंचे से ऊंचा चिंतन नहीं कर सकता। मेरा सुचिंतित मत है कि जिस रूप में अंग्रेजी की शिक्षा यहां दी गई है, उससे अंग्रेजी पढ़े-लिखे हिंदुस्तानी कमजोर हो गए हैं। इस पद्धति ने भारतीय छात्रों की स्नायविक ऊर्जा पर भयानक दबाव डाला है तथा हम सबको नक्काल बना दिया है। कोई भी जाति नक्कालों की कौम पैदा करके बड़ी नहीं हो सकती। मुझे पक्का व...