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अगस्त, 2018 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

देश भक्ति

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आज से सालों पहले जब पापा को पुलिस की वर्दी में सर ऊँचा कर तिरंगे को सलाम करते देखता था तो मुझे लगता था, ये तो बस उनका काम है. स्कूल में रोज़ नेशनल एंथम होता था, पर कभी लगा ही नहीं कि ये कुछ ख़ास है, जैसे ये मेरा अपना है. सच कहूं तो इंडिया की आज़ादी भी मेरे लिए हिस्ट्री का बस एक चैप्टर हुआ करती थी, उससे एक लफ्ज़ ज़्यादा मैंने कभी अपने देश के बारे में नहीं सोचा. बात 1999 की है, इंडिया क्रिकेट वर्ल्ड कप से बाहर हुई थी, तब पहली बार थोड़ा बुरा लगा था, मतलब शायद मेरे लिए "इंडिया" बस वो ग्यारह लोगों की टीम हुआ करती थी जो नीली जर्सी पहनकर हमारे लिए खेलती थी. खैर उसी साल एक और चीज़ हुई, कारगिल. ये वो दौर था, जब ज़्यादा मीडिया नहीं हुआ करता था, तो मुझे बस इतना पता था कि इंडिया और पाकिस्तान में जंग छिड़ गयी है और इंडिया के काफी सैनिक उसमे मारे जा रहे हैं. मैं काफी छोटा था उस समय, तो मुझे ये बातें न तो समझ में आती थीं, न ही कोई फ़र्क़ पड़ता था. खैर एक दिन मम्मी थोड़ी परेशान लग रही थीं तो मैंने पूछा, अरे मम्मी, क्या हो गया. उन्होंने थोड़ा सोच के कहा, कश्मीर में हालत काफी खराब हो गयी है, अगर ज़रुरत प...

एक ग़रीब

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सड़क पर पड़ा हुआ है वो गरीब आदमी सिस्टम सा सड़ा हुआ है वो गरीब आदमी भूख अब भी जिसको तड़पाया करती है खुद से ही लड़ा हुआ है वो गरीब आदमी सत्ता में नेता के झूठे आश्वासनों के खिलाफ सच के लिये अड़ा हुआ है वो गरीब आदमी सर्दी गर्मी बारिश जिसको झुका नहीं पायी मजबूरी में अकड़ा हुआ है वो गरीब आदमी इस झूठी लोकशाही में अपने ही हालात में क़दम-क़दम रगड़ा हुआ है वो गरीब आदमी नफरतों के दौर में आज मुहब्बत ढूंढता हुआ ख्वाबों से भी झगड़ा हुआ है वो गरीब आदमी इंसानियत ज़िंदा है अभी तक उसके अंदर यूँ छोटा नहीं, बड़ा हुआ है वो गरीब आदमी ये दुनिया उसे कभी कहीं देख ही नहीं पाती खजाने सा कहीं गढ़ा हुआ है वो गरीब आदमी जो नहीं कर पाता है मज़हब में फ़र्क़ कोई संविधान सा खड़ा हुआ है वो गरीब आदमी.✍

गांव मेरी नजर मै

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गांव मेरी नजर से -- गांव शब्द को लेकर लोगो मे एक आम धारणा रहती है पीछडेपन से जहाँ किसान अनाज उगाता है, कुएँ के पानी से नहाता है ,कच्चे घरो मे जीवनयापन तथा पशु पालन करता है ॥ हां यह कहाँ जा सकता है यह एक बडी सोसाइटी के सोच हो सकती है जहाँ किसी भी चीज के लिए संघर्ष ख़तम होता है दुनिया की चकाचौंध के बीच लोग गांव को स्पष्ट रूप से नही देख पाते है , गांव को वास्तविक रूप मे जानने के लिए गांव को समझना होगा जहाँ हर चीज के लिए संघर्ष है परन्तु उस संघर्ष मे आनंद है सूकून है,जब गांव मे रहने वाला छोटा सा परिवार शहर की ओर बढता है तो गांव की प्रासंगिकता को छोड़ देता है इससे वह जीवन की मूलभूत संतुलन को खो देता है और जो लोग गांव के प्रति अपनत्व बनाये रखते है उनको आत्म समथर्न तथा संबल बना रहता है ॥ मेरा जीवन पूरी तरह से शहर मे व्यतीत हुआ इसलिए मे जीवन के शुरुआती भाग मे इस शब्द से दूर रहा उसका कारण मेरे परिवार का लगभग सौ साल पहले ही शहर मे बस जाना था, परन्तु जब भी किसी के गांव जाने का अवसर मिलता तो मै उसमे जाने की कोशिश करता, मेरी नजर मे गांव वास्तविक रूप मे धरती के लिए सवर्ग है ॥ कयोंकि यही पयर्वरण...