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स्त्री और पीरियड

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 उसे भी पीरियड्स  आते हैं :- जो मजदूर महिलाएं हफ्तों से पैदल चल रही हैँ उनमे से कइयों के पीरियड्स चल रहे होंगे। कई के अचानक शुरू हुए होंगे। चलते काफिले में अचानक शुरू हुए पीरियड्स के लिए सबको कैसे रुकने को बोल सकती थी वो ?  तो पीरियड्स में चलती रही , 40 मर्दों के बीच ट्रक में बैठी महिला का पीरियड शुरू हो जाये तो क्या करेंगी ?  कैसे मैनेज़ किया होगा ?  रोटी और बच्चों के लिए दूध खरीदने के पैसे नहीं तो पैड्स तो नहीं ही होंगे। कोई कपड़ा होगा भी तो लगातार हफ़्तों के पैदल चलने में कहां धोया,  कब कैसे सुखाया होगा ?  कभी सोचा है  ?  उन दिनों में चलते हुए जाँघ छिल गयी होंगी उसकी । कुछ मजदूर महिलायें गर्भवती भी थी। हमारे घर की गर्भवती को जरा सा दर्द हो तो अस्पताल ले भागते हैं,  उन्होंने अपना दर्द किससे कहा होगा ?  कह भी दिया तो पति कितना बेसहारा और मजबूर नज़र आया होगा कि कुछ नहीं कर सकता , एक मजदूर महिला को चलते हुए लेबर पेन हुआ, उसने रास्ते में बच्चे को जन्म दिया,  बच्चे की नाल काटी और 2 घंटे बाद फिर चलने लगी। आपके घर की महिलाओं की  ह...

राघवेंद्र प्रताप सिंह (एक विचार)

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 समाज जब जन्म ले रहा था तो बहुत सारी चुनौतियां थी, पाषाण युग से लेकर आधुनिक युग तक सभ्य समाज की ललक मै पूरा विश्व है, सारी चुनौतियों से सबसे विकराल और वीभत्स स्थति का मापदंड है गरीबी और अमीरी का भेद, यह भेद ही समाज मै अंतर पैदा करता है, जो साधन योग्य है वो साहूकार हो गया बाकी मानसिकता इतनी विकराल हो गई कि गरीब को गरीब होना ही लाजमी होता चला गया, भारत की बात करे तो आज भी लगभग अस्सी लाख लोग बिना एक समय का खाना खाए सो जाते है, आज भी गरीबी मै भारत विश्व की लगभग एक तिहाई से अधिक जनसंख्या का अधिगम बना है जो की गरीब है, ये सब आंकड़े हम क्यों बता रहे है बताने का कारण है जिस लोकतंत्र मै देश का नौजवान अपना सर्वस्व देकर भी रोजगार की किल्लत को महसूस  करता हो जहा हर महीने आचार संहिता लगती हो सिर्फ वायदों को दोहराने के लिए, उन सबके बीच एक लोकतंत्र प्रहरी। नागरिक *भाई राघवेंद्र प्रताप सिंह* का परिचय बहुत ही संजीदा है, एक व्यक्ति से व्यक्तिव तक का सफर, छोटी सी उम्र मैं समाज को सर्व मानकर उसके लिए अपनी पूरी ऊर्जा लगा देना सब आसान नही होता, सत्य है, और सत्य को प्रमाण की आवश्यकता नही,भगवान राम ...