इक्कसवीं सदी का युवा
भारत की सामाजिक चेतना पिछले कुछ वर्ष में बहुत परिवर्तन हुआ है, विशेष कर युवावर्ग में अगर हम बात करे एक खास वर्ष गठन की तो कह सकते लगभग विसबी सदी के अंत और इक्कसवीं सदी के प्राम्भिक दौर मे यह बहुत परिवर्तन कारी रहा , सर्वप्रथम तो भारत पहली बार अर्थव्यवस्था के संकट में आया और बहुत खूबसूरती से बाहर निकला जीसका मुख्य कारण रहा उदार चरित्र आते आते कम्प्यूटर युग आया और फिर 95 मे नेट का आ जाना इंटरनेट आया और धीरे धीरे पूरे समाज मे पैर पसारने लगा, एक पीढ़ी लगभग समाप्त हुई फिर मोबाइल युग से लेकर आज के मल्टीमीडिया सेट तक, कैमरा से लेकर इंस्टाग्राम सेल्फी तक यह कार्य अनवरत चल रहा है , इन सब के मध्य बात करे चरित्र की या फिर युवान चरित्र की वह लगभग अपनी अंतिम अवस्था मे है,पहले की पीढ़ियों मैं और 90 के बाद वाली और दो हज़ार की बाद वाली मे और ज्यादा खतरा मंडरा गया क्यों कि उन्होंने अपना चरित्र कुछ इस तरह खो दिया जैसे कोई बिल्ली आती है और चौके मैं रखे दूध चट कर जाती है ।। लोगो का समाज से कटाव पूरी तरह से मोबाइल फोन ने ले लिया इसकी चपेट मैं युवा ही आये और अपना नियंत्रण खो दिए, जहा मैदान बच्चों से भरे रहते ...