गांव मेरी नजर मै

गांव मेरी नजर से --
गांव शब्द को लेकर लोगो मे एक आम धारणा रहती है पीछडेपन से जहाँ किसान अनाज उगाता है, कुएँ के पानी से नहाता है ,कच्चे घरो मे जीवनयापन तथा पशु पालन करता है ॥ हां यह कहाँ जा सकता है यह एक बडी सोसाइटी के सोच हो सकती है जहाँ किसी भी चीज के लिए संघर्ष ख़तम होता है दुनिया की चकाचौंध के बीच लोग गांव को स्पष्ट रूप से नही देख पाते है , गांव को वास्तविक रूप मे जानने के लिए गांव को समझना होगा जहाँ हर चीज के लिए संघर्ष है परन्तु उस संघर्ष मे आनंद है सूकून है,जब गांव मे रहने वाला छोटा सा परिवार शहर की ओर बढता है तो गांव की प्रासंगिकता को छोड़ देता है इससे वह जीवन की मूलभूत संतुलन को खो देता है और जो लोग गांव के प्रति अपनत्व बनाये रखते है उनको आत्म समथर्न तथा संबल बना रहता है ॥
मेरा जीवन पूरी तरह से शहर मे व्यतीत हुआ इसलिए मे जीवन के शुरुआती भाग मे इस शब्द से दूर रहा उसका कारण मेरे परिवार का लगभग सौ साल पहले ही शहर मे बस जाना था, परन्तु जब भी किसी के गांव जाने का अवसर मिलता तो मै उसमे जाने की कोशिश करता,
मेरी नजर मे गांव वास्तविक रूप मे धरती के लिए सवर्ग है ॥
कयोंकि यही पयर्वरण (environment) को संतुलित करने का पक्षधर है ॥ गांव लोगो को जोडने का एक साधन है ये जीवन प्रेम अनुशासन और करूणा का भाव देता है जो कि बडे शहर मे रहने वाले और उच्च शिक्षा मिलने के बाद भी नही ले पा रहे है ॥ गांव संघर्ष देता है लेकिन सूकून भी देता है शुद्ध हवा का मनोहारी उदगम है गांव हमारे बडे भईया Pankaj Srivastava जी का गांव से लगाव अदभुत है सब कुछ बाहर होते हुए भी वे गांव से जुड़े है तथा सबको साथ लेकर चलने की चेष्टा करते है ये सभी लोगो के यहाँ है और नही है तो होना चाहिए ॥
जीवन मे सहनशीलता का भाव गांव का वह कुंआ सिखाता है जहाँ लाखो गैलन पानी निकलता परंतु वह अपनी शीतलता को बनाये रखता है बडे बडे पेड अपनी छत्रछाया मे कई पीढ़ियों को सूकून प्रदान करते है , बडे बुजुगो की अनुभव शाम को बेहतरीन बनाती है ॥ गांव के बडे बगीचे मौसमी फलो के पेड मानो खूबसूरती का तमगा देती है ॥
अगर शहर की उंची मंजिल जरूरी है तो गांव का वातावरण भी उतना ही जरूरी है ॥ भारत के प्रथम राष्ट्रपति गांव बचाओ अभियान के पक्षधर रहे है ॥ गांव मे सभी परिवारिक रिश्ते बेहतरी को पाते है भईया भाभी चाचा चाची बाबा दादी सभी के परिवारिक सामंजस्य मजबूत होते है ॥
गांव मे भाभी जी का योगदान सवोर्परि होता है जहाँ शहर मे लोग दो वक्त का भोजन मुश्किल होता है वही गांव मे बंद मढई के नीचे बिना विघुत् के भोजन बनाना आसान नही होता है परंतु ऐसा हो सकता है जहाँ मात्र एक वयक्ति के द्वारा पूरे परिवार जहाँ चालिस से अधिक लोग हो वह भोजन के पयार्प्त वयवस्था हो वाकई अविस्मरणीय होता है॥
हमारे मित्रों मे भी कई मित्र गांव से जुडाव रखते है जिसमे  जो की सभी मित्र बहुत वैचारिक और बेहतरीन है ॥
अंतिम मे यही कहूंगा आज भी भारत की लगभग अस्सी प्रतिशत जनसंख्या गांव मे निवास करती है हम इसे चकाचौंध मे भूला नही सकते है अगर सामाजिक सिथती से लेकर पयावरण तक सोचना है तो उसकी धुरी गांव ही है॥
जवान आँखों के जुगनू चमक रहे होंगे
अब अपने गाँव में अमरुद पक रहे होंगे

भुलादे मुझको मगर, मेरी उंगलियों के निशान
तेरे बदन पे अभी तक चमक रहे होंगे
शिवांक की कलम से ----::::

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