महाराणा प्रताप एक अप्रतिम योद्धा

इतिहास जिन महानुभाव के कारण गौरव करता है खुद पर,वर्तमान भविष्य को नवीन चेतना प्रदान करता है, उसमे एक प्रतापी नाम युगकुल राजा महाप्रतापी महाराणा प्रताप मेवाड़ के महाराणा, भारत के आंचल में सर्वश्रेष्ठ नाम, महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 ईसवी को कुमभलगढ़ पाली राजस्थान में हुआ था, महाराणा उदय सिंह जी के पश्चात महाराणा प्रताप जी का राज्याभिषेक होता है, 1572 ईसवी में अर्थात मात्र बत्तीस वर्ष की अवस्था में यह अवसर उन्हें प्राप्त हुआ, महाराणा प्रताप राजपूत थे, वे भगवा की आन वान शान के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर और समर्पण करने का भाव रखते थे, महाराणा प्रताप के राज्य में अनेकों युद्ध हुए, मुगलिया सल्तनत हावी थी अकबर अपना पैर पसार रहा था परन्तु महाराणा प्रताप अपनी ओजस्वी क्षमता से अकबर को ललकारते ही नहीं अपितु उसे बार बार धूल चटाते है, 1573 के हल्दीघाटी युद्ध में 500 भील जनजाति के साथ अस्सी हजार की सेना को धूल चटाने वाले महाराणा प्रताप ही थे, आपका नेतृत्व आधारभूत ढांचे वाला था, आपने जितने भी युद्ध को लड़ा आपने हिंदुत्व की अग्नपरीक्षा पर सृजित किया एवम् सभी जनजातियों का सहयोग समर्थन से ये आपकी परिपक्व रणनीति का एक महत्वपूर्ण अंग थी, हल्दीघाटी युद्ध में भील सरदार राणा पूंजा जी का योगदान सराहनीय रहा। शत्रु सेना से घिर चुके महाराणा प्रताप को झाला मानसिंह ने आपने प्राण दे कर बचाया ओर महाराणा को युद्ध भूमि छोड़ने के लिए बोला। शक्ति सिंह ने आपना अश्व दे कर महाराणा को बचाया। प्रिय अश्व चेतक की भी मृत्यु हुई। यह युद्ध तो केवल एक दिन चला परन्तु इसमें १७,००० लोग मारे गए। मेवाड़ को जीतने के लिये अकबर ने सभी प्रयास किये। महाराणा की हालत दिन-प्रतिदिन चिंताजनक होती चली गई । २५,००० सैनिकों के १२ साल तक गुजारे लायक अनुदान देकर भामाशाह भी अमर हुए महाराणा प्रताप से अकबर बिना युद्ध के अपने अधीन करना चाहता था उसके लिए उसने चार राजदूतों को भी नियुक्त किया परन्तु आप नहीं झुके और सीधे ललकार दी अकबर को और वीभत्स युद्ध हुआ दोनों के मध्य हल्दीघाटी का जिसमे महाराणा प्रताप और मुगलिया सल्तनत के बीच, मुगल की और से नेतृत्व कर रहे थे मान सिंह और आसफ खान इस युद्ध में बुरी तरह से मुगलों के छक्के छूट गए आदि विराट पुंज महाराणा प्रताप से युद्ध में अंत काल तक अंतकाल प्रताप युद्ध लड़ते हैं और मेवाड़ की सेना का नेतृत्व करते हैं इतना ही नहीं मुगलिया सल्तनत को धूल चटा देते हैं अकबर बुरी तरीके से परास्त माना जाता है इतिहासकारों ने हल्दीघाटी का कोई परिणाम नहीं दिया परंतु महाराणा प्रताप युद्ध में पूरी तरीके से जीते थे और युद्ध को आखरी तक ले गए थे उस महान शूरवीर प्रतापी सम्राट अश्वमेघ रघुकुल शिरोमणि राजपूत महाराणा प्रताप को दंडवत प्रणाम ।। इसके पश्चात होता है दिवेर का युद्ध इसमें महाराणा प्रताप ने बहुत से जमीने मुगल सल्तनत से जीती थी अकबर के मन में महाराणा प्रताप से ईतना अधिक भय बैठ गया था कि वह लाहौर अपनी राजधानी लेकर चला गया और तब तक नहीं आया जब तक महाराणा प्रताप जी का देहांत नहीं हो गया, जब देहांत महाराणा जी का हो गया तब आगरा अपनी राजधानी लेकर आया, महाराणा प्रताप जी अपने आखिरी दिनों तक एक भी पराधीनता को स्वीकार नहीं किया मुगलिया सल्तनत को लगातार चुनौती देते रहे अकबर की सेना को मार मार कर अपने मेवाड़ से दूर भगाया इतना ही नहीं अकबर को विवश कर दिया उन्होंने घास की रोटियां खाने को मंजूर किया परंतु उन्होंने पराधीनता को गले नहीं लगाया ।। अब यह प्रश्न है ऐसे वीर प्रतापी सम्राट महाराणा प्रताप इतिहास के पन्नों में अकबर को महान बता दिया जाता है तब महाराणा प्रताप कौन थे या प्रश्न है वह महाराणा प्रताप जिसने एक भी मुगलिया सल्तनत की किसी भी संधि को स्वीकार नहीं किया तथा अकबर जैसे दुष्ट आक्रांता को उसी की भाषा में जवाब देने का बाहुबल समर्थित किया तब महाराणा प्रताप कौन थे या प्रश्न चिन्ह है? तब महाराणा प्रताप कौन थे या सुनने के लिए किसी इतिहासकार की आवश्यकता भी नहीं, हिंदुत्व सल्तनत की भगवा की आन बान शान की महादेव की सौगंध उठाते हुए जिस ने युद्ध किया जिसने जात पात की परंपरा को निढाल बना दिया वह सम्राट महान ही नहीं अपितु इस पूरे भारतवर्ष के लिए दिव्य चेतना कि वह आत्मा है जो लाखों लाख वर्ष तक हिंदुत्व की अग्नि को जलाए रखेगा समर्थ रखेगा, यहां पर एक बात अवश्य आज परिपेक्ष में होती है जो लोग महाराणा प्रताप को उल्लेखित करना चाहते हैं अपने को उनके वंश से जोड़ना चाहते हैं तो यह बात अवश्य बोलूंगा वर्तमान समय के सबसे बड़े भदरी रियासत के सुकुमार राजपूत रघुराज प्रताप सिंह जी का एक सुंदर सा भाषण है,वह हम सबके आदरणीय हैं और राजपूत परंपरा के और हिंदुत्व के विशालतम चेहरा है तो रघुराज प्रताप सिंह जी कहते हैं जब महाराणा प्रताप जी अपने जंगलों में थे घास तक रोटियां खाने में मजबूर थे तो उनके साथ गांव गरीब और दलित शोषित जातियां ही उनका सरंक्षण कर रही थी महाराणा प्रताप जी ने अंत तक जात पात का भ्रम नहीं पाला वह एक भगवा के नीचे अपना पूरा साम्राज्य का विस्तार करते थे जब हम अपने को उस राजपूत परंपरा से जुड़े तब हम आक्रामकता के साथ-साथ उनकी विनम्रता को भी सीखें उनके सम्मान को भी सीखें उनके नेतृत्व को भी सीखें उनकी रणनीतियों को भी सीखें तब सही मायने में उस परमवीर प्रतापी सम्राट महाराणा प्रताप की सच्ची श्रद्धांजलि होगी, इसके पश्चात महाराणा प्रताप हमेशा हमेशा के लिए अमर हो गए हैं उनका लड़ा हुआ हल्दीघाटी का युद्ध हो या फिर मेवाड़ का मैराथन हो अकबर धारा भेजे गए चार संधि हो सामने खड़े मानसिंह हो इन सभी शक्तियों को परास्त करते हुए महाराणा प्रताप अमर हुए हमेशा हमेशा के लिए अमर हुए, हम महाराणा प्रताप को हृदय से बारंबार नमन करते हैं ऐसे सच्चे सपूत भारत की धरती को हमेशा हमेशा के लिए दिव्य बना कर जाते हैं।। जय भवानी जय महाराणा #हरहर महादेव आपका शिवांक

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